बॉल पैड से टकराई. गेंदबाज़ की ज़ोरदार अपील. अंपायर ने सहमति जताई. और ये आउट.
क्रिकेट में जितने ज़रूरी खिलाड़ी होते हैं, उतने ही अहम हैं मैदान में खड़े दो ऐसे शख़्स, जिनका किसी टीम के कोई ताल्लुक नहीं होता, लेकिन इनके बग़ैर कोई मैच नहीं खेला जाता|
उनका एक सही या गलत फ़ैसला मैच का रुख़ पलट सकता है| हम बात कर रहे हैं क्रिकेट अंपायर की| लेकिन अंपायर बनना आसान नहीं है| ना ही ये सिर्फ़ नियम याद रखने भर का काम है| अंपायर बनने के पीछे कई साल की मेहनत, ट्रेनिंग, गलतियों से मिली सीख और अनुभव छिपा होता है|
अब आता है अगला ज़रूरी सवाल. अंपायर बनते कैसे हैं? क्या इसके लिए क्रिकेट का खिलाड़ी होना ज़रूरी है या कोई और भी उपाय है. कितनी कमाई होती है और इस प्रोफेशन में ग्रोथ का ग्राफ़ क्या है.
करियर कनेक्ट सिरीज़ की आज की कड़ी में हमने जाने-माने अंपायरों से जाने इन्हीं सवालों के जवाब|
ये सवाल अक्सर सामने आता है कि अम्पायर बनने के लिए क्या किसी तरह की ख़ास पढ़ाई की ज़रूरत है. जवाब है 'नहीं'.
आप किसी भी स्ट्रीम से पढ़े हों, बस आपकी रुचि होनी चाहिए क्रिकेट के नियमों में. साथ ही इस प्रोफ़ेशन में मैदान में कई घंटे खड़े भी रहना होता है, तो फ़िजिकली फ़िट होना ज़रूरी है.
"अगर कोई क्रिकेट खेलता रहा है या अब भी खेल रहा है तो वो भी अम्पायरिंग में अच्छा कर सकते हैं, लेकिन अगर उन्होंने क्रिकेट बिल्कुल नहीं खेला है और सोचे कि मैं अम्पायरिंग की फ़ील्ड में आ जाऊंगा तो ये मुश्किल काम हो सकता है."
जानकार कहते हैं कि अम्पायर बनने के लिए अच्छा कम्युनिकेशन और अंग्रेज़ी का ज्ञान ज़रूरी है. अंग्रेज़ी इसलिए क्योंकि क्रिकेट की कॉमन लैंग्वेज वही है. इंटरनेशनल मैच में अलग-अलग देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं और अंग्रेज़ी ही ज़रिया होती है.
अब बात उम्र की. अम्पायर बनने के लिए जो परीक्षाएं होती हैं वो देने के लिए उम्र कम से कम 18 साल और ज़्यादा से ज़्यादा 40 साल होनी चाहिए
अम्पायर बनने की क्या है प्रक्रिया?
अगर आपकी उम्र 18 से 40 साल के बीच तो अपने राज्य के क्रिकेट एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन करवा लें. मसलन, अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (DDCA) या उत्तर प्रदेश में हैं तो यूपी क्रिकेट एसोसिएशन (UPCA) जाएं.
हमने जब उनसे रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "रजिस्ट्रेशन कोई भी करवा सकता है, पढ़ाई क्या की है, इस पर कोई नियम नहीं है. कोई बारहवीं पास भी अम्पायर बन सकता है. फिर स्टेट एसोसिएशन में जो स्पोर्ट्स ऑफ़िसर होते हैं या फिर अम्पायरिंग इंचार्ज, उनसे मुलाकात करें और बताएं कि आपकी रुचि अम्पायरिंग में है. वहां से शुरुआत करें और वहां तक कोई एग्ज़ाम नहीं पास करना होता."
वो आपको बताएंगे कि आगे के लिए कोई फॉर्म भरना है तो उसे भरें, उनके लीग मैचों में अम्पायरिंग का मौका मिले तो ज़रूर करें. या फिर उनका जो भी लोकल सेटअप है, उसके हिसाब से आगे कदम उठाएं. वहां सीनियर अम्पायर से मिलें, वो आपको बताएंगे कि पूरी प्रक्रिया क्या है. बुनियादी बात ये है कि अगर आपको आगे जाना है, तो आपका सफ़र स्टेट बॉडी से ही शुरू होगा."
अम्पायरिंग शुरू करने के लिए कोई एग्ज़ाम नहीं होता, लेकिन जब राज्य के क्रिकेट एसोसिएशन पैनल बनाते हैं, तो उसमें चुनाव एग्ज़ाम के ज़रिए होता है, जो वो खुद ही करवाते हैं.
उन्होंने कहा, "बीसीसीआई से जुड़ने के लिए पहले लोकल मैचों में अनुभव लेना ज़रूरी है. इसके बाद स्टेट एसोसिएशन जो नाम भेजती हैं, उन्हें बीसीसीआई का एग्ज़ाम देना होता है. पहले बीसीसीआई लेवल 1 और लेवल 2 के एग्ज़ाम करवाता था, लेकिन अब एक ही परीक्षा होती है."
कैसे मिलता है काम?

जब भी क्रिकेट एसोसिएशन अम्पायरों के लिए परीक्षा करवाते हैं, तो ये आम तौर पर सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया या बाकी प्लेटफॉर्म पर बताते हैं कि वे कब परीक्षा लेने जा रहे हैं.
"बहुत सारे स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन पहले अपनी परीक्षा करवाते हैं, फिर जब बीसीसीआई का अम्पायरिंग का एग्ज़ाम होता है, तो उनके लिए वो नाम भेजते हैं. आम तौर पर उन्हीं के नाम भेजे जाते हैं जो अम्पायरिंग करते हैं और साथ में स्टेट के नए-नए नियमों से अवगत रहते हैं."
वो बताते हैं कि एग्ज़ाम का तरीका है कि पहले थ्योरी, फिर प्रैक्टिकल और आख़िर में वाइवा होगा. तीनों परीक्षाओं में मिलाकर 90 फ़ीसदी अंक लाने पर आगे बढ़ सकते हैं.
बीसीसीआई का एग्ज़ाम पास करने के बाद अम्पायरिंग के लिए मैच मिलने लगते हैं, लेकिन शुरुआत में जूनियर लेवल के मैच मिलते हैं. जैसे अंडर-15, अंडर-19. धीरे-धीरे क्वालिटी में सुधार आने और परफॉर्मेंस अच्छी होने पर बीसीसीआई प्रमोट करता है.
जानकारों के मुताबिक इसके बाद सीनियर मैच में अम्पायरिंग शुरू होती है, जैसे दलीप ट्रॉफ़ी, रणजी ट्रॉफ़ी, टी-20, टी-20 नॉकआउट. ये सफ़र करीब पांच-छह सालों का होता है.
इसके बाद जो अच्छे अम्पायर होते हैं, उन्हें सबसे पहले आईपीएल मैच मिलते हैं. फिर इंटरनेशनल मैच भी मिलने लगते हैं.
बीसीसीआई में क़रीब 150 अम्पायर हैं. औसतन हर तीन साल में एक बार वैकेंसी निकलती है.
आईसीसी में कैसे बनती है जगह?
इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी ने दुनिया भर के बेस्ट अम्पायरों का एक पैनल बनाया हुआ है. ये पैनल पहली बार साल 2002 में बना था.
वर्ल्ड कप या टेस्ट सिरीज़ सरीख़े किसी भी बड़े आईसीसी टूर्नामेंट में अम्पायरिंग का ज़िम्मा, इसी पैनल के सदस्यों पर होता है.
"इंटरनेशनल अम्पायर बीसीसीआई के सारे अम्पायरों में से सिर्फ़ दो-चार ही बन सकते हैं. जैसे-जैसे इनका अनुभव बढ़ता जाता है और बीसीसीआई की ओर से उनके हर मैच के परफॉर्मेंस की रिपोर्ट तैयार की जाती है, फिर उसी आधार पर इंटरनेशनल और टेस्ट मैच मिलते हैं."
"एलीट पैनल का मतलब ही है एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी अम्पायरिंग. इंटरनेशनल मैच जैसे वर्ल्ड कप हो या एशिया कप हो, इन्हीं को अम्पायरिंग के लिए बुलाया जाता है. क्योंकि इनसे गलती की गुंजाइश ना के बराबर होती है."
किस विषय की पढ़ाई करें?
अब सवाल ये भी है कि अगर कोई ख़ास डिग्री नहीं चाहिए तो फिर अम्पायर बनने के लिए क्या पढ़ना चाहिए. इसके लिए ज़रूरी स्टडी मेटेरियल क्या है और ये कहां मिल सकता है.
सबसे पहले, आपके पास एमसीसी (मेरिलेबोन क्रिकेट क्लब) लॉ बुक होनी चाहिए. ये आसानी से इंटरनेट या दुकान में मिल जाएगी.
एक और किताब है जो लॉ का कॉन्सेप्ट समझने में मदद करती है. ये है टॉम स्मिथ की क्रिकेट अम्पायरिंग एंड स्कोरिंग. इसका नया एडिशन ही खरीदें.
इसके बाद बीसीसीआई की जो लेटेस्ट प्लेइंग कंडीशंस हैं, वो भी पढ़ लें. क्योंकि एग्ज़ाम बीसीसीआई की प्लेइंग कंडीशंस पर होगा.
बीसीसीआई चाहता है कि ऐसे लोग अम्पायरिंग करें जो खेलते भी हैं लेकिन उनके चयन की प्रक्रिया भी यही है.
जानकार किसी भी कैंडिडेट के लिए मेडिकल फ़िटनेस ज़रूरी बताते हैं.
अगर किसी की आंख की रोशनी कमज़ोर है, लेकिन वो चश्मे के साथ देखने में सक्षम हैं तो फिर ऐसे लोगों के चुनाव में दिक्कत नहीं होती.
"वज़न, कान, आंख इन सबके लिहाज़ से कैंडिडेट का फिट होना ज़रूरी है. कोई ज़्यादा वज़न का अम्पायर कैसे सात-आठ घंटे मैदान पर खड़ा रहेगा, आज कर गेम इतना फ़ास्ट हो गया है. जो फ़िज़िकली फिट ना हो, तो मानसिक तौर पर भी थकान हो जाती है. फिर सब गड़बड़ होता है."
जो ज़रूरी है. जैसे आत्मविश्वास होना चाहिए. जजमेंट की पावर और समझ होनी चाहिए. मैदान का सम्मान होना चाहिए. कम्युनिकेशन ठीक होना चाहिए, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि खाली आप अंग्रेज़ी बोलना जानते हों.
वहीं एस के बंसल ने कहा, "चश्मे के साथ भी दिखाई पूरा देना चाहिए क्योंकि अगर बॉल ही दिखाई ना दे तो फिर क्या ही कर लेंगे. इतना फ़िट होना चाहिए कि बॉल के साथ-साथ मेरा भी मूवमेंट हो. मान लीजिए कि बल्लेबाज़ सामने शॉट लगा दे और मैं अपने आप को ही बचा ना पाऊं तो फिर कैसा अम्पायर. जैसे बल्लेबाज़ को पता होता है कि कैसे अपनी बॉडी को बचाते हुए गेंद पर बल्ले से मारना है, ठीक वैसे ही अम्पायर को भी अपनी बॉडी का ध्यान रखना होता है और ये फ़िटनेस से ही संभव है."
पैसे कितने मिलते हैं?
जानकारों के मुताबिक, अम्पायरिंग एक ऐसा पेशा है, जिसमें पैसे अच्छे-खासे मिलते हैं और साथ में सुविधाएं भी.
"फ़ाइव स्टार या टॉप क्वॉलिटी होटल में ठहरने को मिलता है, एयर फेयर मिलता है. कुछ और भी भत्ते मिलते हैं. बीसीसीआई डोमेस्टिक क्रिकेट में इतनी सुविधाएं मिलती हैं, जो कई देशों में इंटरनेशनल अम्पायरों को भी नहीं मिलती."
उनमें एक अम्पायर को औसतन एक दिन का तीन हज़ार रुपए के आसपास रकम मिलती है. इसके अलावा सफर का खर्चा, रहने का खर्चा भी मिलता है.
"बीसीसीआई में जब आप अम्पायरिंग शुरू करते हैं तो मैच वाले दिन 40 हज़ार रुपये मिलते हैं. अगर मैच पांच दिन का है, तो भले ही मैच दो दिन में खत्म हो, पैसे पांच दिन के ही मिलते हैं. बीसीसीआई में जो शुरुआत करते हैं, उन्हें साल में क़रीब चालीस दिन अम्पायरिंग के लिए मिलते हैं. कुछ लोग 70 दिन भी करते हैं."
"बस आप में वो क्षमता, कौशल का होना ज़रूरी है कि आप मैदान में ठंड-गर्मी, धूल और आक्रामक खेल के बीच भी संयम से टिके रहें| एक अम्पायर के रिटायर होने की उम्र 65 साल है, लेकिन अमूमन लोग 60 साल में रिटायरमेंट ले लेते हैं. लेकिन इसके बाद उन्हें बीसीसीआई की तरफ़ से कोई सुविधा नहीं मिलती.
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