नई दिल्ली। भारत में पिछले एक दशक के दौरान गरीबी में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। बड़ी संख्या में लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए हैं और रोजगार के अवसरों में भी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन आर्थिक विकास की इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। देश में अमीर और गरीब के बीच कमाई का अंतर अब भी काफी बड़ा बना हुआ है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2023 में भारत के सबसे ज्यादा कमाने वाले 10 प्रतिशत कर्मचारियों की औसत आय सबसे कम कमाने वाले 10 प्रतिशत कर्मचारियों की तुलना में करीब 13 गुना अधिक थी। यह आंकड़ा बताता है कि गरीबी कम होने के बावजूद आय की असमानता देश के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
2011 से 2023 के बीच गरीबी में कितनी आई कमी?
वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रतिदिन 3 डॉलर की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात वर्ष 2011 में 27.1 प्रतिशत था। वर्ष 2023 तक यह घटकर महज 2.6 प्रतिशत रह गया। यानी इस पैमाने पर गरीबी में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि, गरीबी की स्थिति को समझने के लिए 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाला पैमाना भी महत्वपूर्ण है। इस आधार पर वर्ष 2023 में भारत की करीब 16.1 प्रतिशत आबादी गरीबी के दायरे में थी। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2011 से 2023 के बीच लगभग 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर आए। इसके बावजूद करीब 23.2 करोड़ लोग ऐसे थे, जिनकी दैनिक आय इस सीमा से नीचे थी।
इससे साफ है कि गरीबी में कमी जरूर आई है, लेकिन देश की एक बड़ी आबादी अब भी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है।
अमीर और गरीब की कमाई में 13 गुना अंतर क्यों?
रिपोर्ट में आय की असमानता के पीछे रोजगार की गुणवत्ता को एक अहम कारण बताया गया है। देश में रोजगार के अवसर बढ़े हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोग ऐसे कामों में लगे हैं जहां वेतन कम है और काम से होने वाली उत्पादकता भी सीमित है। ऐसे में रोजगार मिलने के बावजूद हर व्यक्ति की कमाई में एक जैसा सुधार नहीं हो पाता।
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, वर्ष 2017 से 2023 के बीच भारत में रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या करीब 13.4 करोड़ बढ़ी। इस दौरान ग्रामीण महिलाओं की रोजगार में भागीदारी ने भी अहम भूमिका निभाई। हालांकि, केवल रोजगार के आंकड़े बढ़ना पर्याप्त नहीं है। नियमित आय, बेहतर वेतन और सुरक्षित रोजगार के अवसर भी जरूरी हैं, ताकि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच सके।
गांवों में गरीबी शहरों से दोगुने से भी ज्यादा
ग्रामीण और शहरी भारत के बीच गरीबी का अंतर भी रिपोर्ट में सामने आया है। 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के आधार पर वर्ष 2023 में ग्रामीण भारत की 19.3 प्रतिशत आबादी गरीबी के दायरे में थी। वहीं, शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 8.6 प्रतिशत था।
यानी शहरों की तुलना में गांवों में गरीबी की समस्या कहीं ज्यादा बनी हुई है। ग्रामीण इलाकों में खेती पर निर्भरता, सीमित गैर-कृषि रोजगार और नियमित कमाई के अवसरों की कमी जैसी चुनौतियां इस अंतर को समझने में महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर बढ़ाना इस स्थिति में सुधार के लिए जरूरी होगा।
2028 तक और कम हो सकती है गरीबी
वर्ल्ड बैंक के अनुमान के मुताबिक, 4.20 डॉलर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात वर्ष 2026 में घटकर 14.2 प्रतिशत और 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकता है। यह अनुमान गरीबी में आगे भी कमी की संभावना दिखाता है।
हालांकि, गरीबी का अनुपात घटने के साथ यह देखना भी जरूरी होगा कि लोगों की वास्तविक आय कितनी बढ़ रही है और उन्हें किस तरह का रोजगार मिल रहा है। अगर रोजगार अस्थायी या कम वेतन वाले होंगे, तो आर्थिक सुरक्षा हासिल करना मुश्किल बना रहेगा।
अब चुनौती सिर्फ गरीबी घटाने की नहीं, असमानता कम करने की भी
वर्ल्ड बैंक के आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रखते हैं। एक तरफ करोड़ों लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए हैं, वहीं दूसरी तरफ अमीर और गरीब की कमाई में बड़ा अंतर बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी का ऊंचा स्तर भी बताता है कि विकास का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचा है।
आने वाले वर्षों में भारत के लिए जरूरी होगा कि रोजगार की संख्या बढ़ाने के साथ उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाए। बेहतर वेतन, कौशल आधारित नौकरियां, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती और सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन ही गरीबी में आई गिरावट को स्थायी आर्थिक सुधार में बदलने में मदद कर सकते हैं।

