होम / मनोरंजन / 75 दिन बाद संपन्न हुआ बस्तर दशहरा, माता मावली की विदाई पर भावुक हुए श्रद्धालु, फूलों से सजा मंदिर परिसर कलश यात्रा और मंगल गीतों के बीच माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र को दी गई विदाई, हजारों श्रद्धालु हुए शामिल, परंपरागत पूजा के साथ संपन्न हुआ ऐतिहासिक पर्व
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जगदलपुर। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान माने जाने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा का मंगलवार, 27 अक्टूबर को विधिवत समापन हो गया। करीब 75 दिनों तक चले इस अनूठे पर्व का समापन माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की ससम्मान विदाई के साथ हुआ। जगदलपुर के राजमहल परिसर स्थित ऐतिहासिक मां दंतेश्वरी मंदिर में परंपरागत विधि-विधान और मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद पुलिस जवानों ने माता को सलामी दी। विदाई के इस भावुक अवसर पर सिर पर कलश धारण किए महिलाओं ने मंगल गीत गाए और हजारों श्रद्धालुओं ने जयकारों के बीच माता को विदाई दी।
बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के लिए जाना जाता है। दूसरे क्षेत्रों में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से अलग, यहां की धार्मिक परंपराओं में मां दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवताओं और बस्तर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का विशेष महत्व है। माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की विदाई के साथ इस वर्ष के लंबे धार्मिक आयोजन का औपचारिक समापन हुआ।
माता की विदाई यात्रा को विशेष बनाने के लिए मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर और यात्रा मार्ग को लगभग डेढ़ क्विंटल गेंदे, गुलाब और बासंती फूलों की पंखुड़ियों से सजाया गया था। जैसे ही माता की डोली आगे बढ़ी, वहां मौजूद श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए और गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा कर माता को विदाई दी। पूरा परिसर भक्तिमय माहौल से गूंज उठा।
इस दौरान करीब 15 साल पुरानी डोली आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। बेल और सागौन की लकड़ी से बनी इस डोली में करीब चार किलो चांदी का काम किया गया है। इसके दोनों ओर चांदी की प्रतिमाएं और 45 चांदी के गुब्बे जड़े हुए हैं। यह डोली बस्तर की धार्मिक परंपरा और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।
परंपरा के अनुसार, बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव और अन्य श्रद्धालुओं ने माता की करीब 20 किलो वजनी डोली को अपने कंधों पर उठाया। डोली को जिया डेरा तक पहुंचाया गया। इसके बाद माता की डोली और छत्र को दंतेवाड़ा के लिए विदा किया गया।
माता की विदाई के अवसर पर मंदिर में दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालुओं को प्रसाद भी वितरित किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 76 किलो बूंदी और लड्डू से तैयार पांच हजार से अधिक पैकेट बांटे गए। विदाई की धार्मिक रस्म के तहत माता को 25 किलो चावल, 11 किलो दाल, घी, मसाले और श्रृंगार सामग्री भी भेंट स्वरूप अर्पित की गई।
बस्तर दशहरा के दौरान अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठानों में क्षेत्र के अनेक देवी-देवताओं की परंपरागत भागीदारी रही। यह पर्व केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि बस्तर की जनजातीय संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और ऐतिहासिक परंपराओं का भी प्रतीक है। माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की विदाई के साथ इस वर्ष के 75 दिवसीय आयोजन का समापन हुआ।
कार्यक्रम में राज्य नीति आयोग के उपाध्यक्ष गणेश शंकर मिश्रा, बस्तर सांसद और बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी सहित मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरीन, नाईक-पाईक और अन्य पारंपरिक पदाधिकारी मौजूद रहे। इसके साथ ही बस्तर संभाग के कमिश्नर डोमन सिंह, जिला प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी, गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस ऐतिहासिक विदाई के साक्षी बने।
माता मावली की डोली की विदाई के साथ जगदलपुर में आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा यह भव्य पर्व संपन्न हो गया। श्रद्धालुओं ने माता से क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
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