होम / सामाजिक गतिविधियां / समाज जीवन की ज्ञाता वंदनीय लक्ष्मी बाई केलकर (मौसी जी) – एक संकल्प, एक साधना और राष्ट्र सेविका समिति के 90 वर्ष पू
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कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन केवल उनकी अपनी कहानी नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का प्रकाशपुंज बन जाता है। वे अपने समय की परिस्थितियों से समझौता नहीं करते, बल्कि अपने विचार, साहस और साधना से परिस्थितियों को नई दिशा देते हैं। वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर जी, जिन्हें समूचा सेविका परिवार श्रद्धापूर्वक ‘मौसी जी’ के नाम से स्मरण करता है, ऐसा ही एक तपस्विनी व्यक्तित्व थीं। राष्ट्र सेविका समिति के रूप में उन्होंने जिस विचार का बीजारोपण किया, वह आज नौ दशकों की साधना के बाद एक विशाल वटवृक्ष के रूप में हमारे सामने है।
वर्ष 1936 केवल एक संगठन की स्थापना का वर्ष नहीं था; वह भारतीय नारी की अंतर्निहित शक्ति को संगठित रूप में राष्ट्रजीवन से जोड़ने के एक दूरदर्शी संकल्प का प्रारंभ था।उस समय का समाज अनेक परिवर्तनकारी परिस्थितियों से गुजर रहा था। देश स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था, किंतु महिलाओं की शक्ति, प्रतिभा और नेतृत्व को संगठित दिशा देने की आवश्यकता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण थी। मौसी जी ने समाज की इस आवश्यकता को गहराई से समझा। उन्होंने अनुभव किया कि नारी केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि संस्कारों की संवाहक और राष्ट्र के भविष्य को गढ़ने वाली शक्ति है। यदि इस शक्ति को उचित दिशा, संगठन और प्रशिक्षण मिले, तो वह राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उनकी दूरदृष्टि केवल तत्कालीन समस्याओं के समाधान तक सीमित नहीं थी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के निर्माण पर केंद्रित थी। इसी चिंतन से महिलाओं के व्यक्तित्व विकास, अनुशासन, आत्मविश्वास और राष्ट्रनिष्ठा को केंद्र में रखकर एक स्वतंत्र संगठन की आवश्यकता का विचार विकसित हुआ। मौसी जी ने नारी को केवल परिस्थितियों के अनुरूप ढलने वाली शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि परिस्थितियों को दिशा देने वाली राष्ट्रशक्ति के रूप में देखा। इसी दूरदर्शी विचार ने 1936 में राष्ट्र सेविका समिति के रूप में साकार स्वरूप प्राप्त किया।
मौसी जी के व्यक्तित्व की जड़ें उनके बाल्यकाल के संस्कारों में थीं। उनके जीवन-वृत्त में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार, उनकी मातायशोदाबाई लोकमान्य तिलक जी के समाचारपत्र “केसरी” का वाचन आसपास की महिलाओं को एकत्र करके करती थीं। उस समय विदेशी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रसार करना अपने आप में साहस और दृढ़ता का कार्य था। बालिका कमल ने अपने घर में ही राष्ट्रप्रेम, विचारशीलता और सामाजिक जागरण का वातावरण देखा।

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